पलायन


एक बादशाह था. उसके दो बेटे थे, जो अपने वालिद से बहुत प्यार करते थे. बादशाह का बर्ताव अपने दोनों के बेटों के साथ बहुत अलग था. बड़े बेटे को हर तरह की आज़ादी थी, उसके लिए ऐशो-इशरत का हर सामान था. वह जहां चाहे, वहां घूमता. बादशाह की सल्तनत बहुत बड़ी थी, उसमें हरी घास के बड़े-बड़े मैदान थे, घने जंगल थे, अनाज और सब्ज़ियों के खेत थे, फलों-मेवों के बाग़ थे, रंग-बिरंगे फूलों से महकते चमन थे, नदियां थीं, झरने थे और दूर-दूर तक फैला समन्दर था. बड़े बेटे की ज़िन्दगी बहुत ख़ुशहाल थी.
छोटे बेटे को महल से बाहर जाने तक की सख़्त मनाही थी. कभी वह महल की छत पर चला जाता या झरोखे से बाहर झांक भी लेता, तो उसे इसके लिए सज़ा दी जाती थी. छोटे बेटे की ज़िन्दगी अज़ाब बन चुकी थी. वह भी अपने बड़े भाई की तरह महल से बाहर की दुनिया देखना चाहता था, लेकिन वो एक क़ैदी था, महल का क़ैदी. एक दिन ऐलान हुआ कि बादशाह की मौत के बाद बड़े बेटे को बादशाह बना दिया जाएगा और छोटे बेटे को क़ैदख़ाने में डलवा दिया जाएगा.
छोटे बेटे ने ये बात सुनी, तो उसकी रूह कांप गई. वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे किस बात की सज़ा मिल रही है. एक दिन उसने महल की एक बूढ़ी औरत से इस बारे में पूछा, तो उसने बताया कि बादशाह का यही उसूल है. बड़े बेटे को शाही ज़िन्दगी दी जाती है और छोटे बेटे को क़ैदी वाली ज़िन्दगी गुज़ारनी पड़ती है. छोटे बेटे ने कहा कि यह तो सरासर नाइंसाफ़ी है. वह इस बारे में बादशाह से बात करेगा. बूढ़ी औरत ने कहा कि ऐसा कभी मत करना, क्योंकि अगर तुमने ऐसा क्या तो तुम्हें बाग़ी माना जाएगा और फिर मौत की सज़ा दे दी जाएगी. बादशाह की हर बात सही होती है, उसके ख़िलाफ़ जाने वाले को अपनी ज़िन्दगी से भी हाथ धोना पड़ता है.
छोटा बेटा बहुत परेशान था. वह सोचने लगा कि जब उसके वालिद को छोटे बेटे के साथ ऐसा ही बर्ताव करना था, जो उसे पैदा ही न करते. अपनी ही औलाद से इतनी नफ़रत. अब उसके पास एक ही रास्ता था कि वह ये सल्तनत छोड़ कर चला जाए. ऐसी सल्तनत में क्या रहना, जहां वह चैन का एक पल भी न गुज़ार सके.
-फ़िरदौस ख़ान
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2 Response to "पलायन"

  1. Anita says:
    28 अक्तूबर 2015 को 10:33 am

    बड़ा बेटा बड़ा दिल है और छोटा बेटा छोटा दिल..या कहें बड़ा रूह है और छोटा दिमाग..जो सदा कैद ही रहता है अपनी बनाई दीवारों में..

  2. राजेंद्र कुमार says:
    29 अक्तूबर 2015 को 12:37 pm

    आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.10.2015) को "आलस्य और सफलता "(चर्चा अंक-2145) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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