सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नाम एक खुला पत्र

आदरणीया सोनिया गांधी जी और सम्मानीय राहुल गांधी जी !
जैसा कि आप जानते हैं. पिछले कुछ सालों से देश एक बुरे दौर से गुज़र रहा है. नोटबंदी और जीएसटी की वजह से काम-धंधे बंद हो गए हैं. लगातार बढ़ती महंगाई से अवाम का जीना दुश्वार हो गया है. देश में सांप्रदायिक और जातिगत तनाव बढ़ा है. देश की एकता और अखंडता ख़तरे में पड़ गई है. ऐसी हालत में अवाम को कांग्रेस से बहुत उम्मीदें हैं.
लेकिन ईवीएम की वजह से अवाम परेशान है. उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव के दौरान ऐसे मामले सामने आए हैं, जब मतदाताओं ने वोट कांग्रेस को दिया है, लेकिन वह किसी अन्य दल के खाते में गया है. इस मामले में कहा जा रहा है कि मशीन ख़राब है. माना कि मशीन ख़राब है, तो फिर सभी वोट किसी ’विशेष दल’ के खाते में ही क्यों जा रहे हैं? साल के शुरू में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसे मामले सामने आए थे. किसी विशेष दल के खाते में वोट जाने के मसले को लेकर जहां पार्टी कार्यकर्ता परेशान हैं, वहीं मतदाता भी कशमशक में हैं.

जैसा कि आप जानते हैं, लोकतंत्र यानी जनतंत्र. जनतंत्र इसलिए क्योंकि इसे जनता चुनती है. लोकतंत्र में चुनाव का बहुत महत्व है. निष्पक्ष मतदान लोकतंत्र की बुनियाद है. यह बुनियाद जितनी मज़बूत होगी, लोकतंत्र भी उतना ही सशक्त और शक्तिशाली होगा. अगर यह बुनियाद हिल जाए, तो लोकतंत्र की दीवारों को दरकने में देर नहीं लगेगी. फिर लोकतंत्र, राजतंत्र में तब्दील होने लगेगा. नतीजतन, मुट्ठी भर लोग येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतकर लोकतंत्र पर हावी हो जाएंगे.

देश की आज़ादी के बाद निरंतर चुनाव सुधार किए गए. मसलन मतदाता की उम्र घटाकर कम की गई, जन मानस ख़ासकर युवाओं और महिलाओं को मतदान के लिए प्रोत्साहित किया गया. इन सबसे बढ़कर मत-पत्र के इस्तेमाल की बजाय इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) द्वारा मतदान कराया जाने लगा. इससे जहां वक़्त की बचत हुई, मेहनत की बचत हुई, वहीं धन की भी बचत हुई. इतना ही नहीं, मत पेटियां लूटे जाने की घटनाओं से भी राहत मिली. लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि ईवीएम की वजह से चुनाव में धांधली कम होने की बजाय और बढ़ ज़्यादा गई. पिछले काफ़ी वक़्त से चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. इस तरह की ख़बरें देखने-सुनने को मिल रही हैं कि बटन किसी एक पार्टी के पक्ष में दबाया जाता है और वोट किसी दूसरी पार्टी के खाते में चला जाता है. इसके अलावा जितने लोगों ने मतदान किया है, मशीन उससे कई गुना ज़्यादा वोट दिखा रही है.

जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज केंद्र की सत्ता में नहीं है, लेकिन इसके बावजूद वह देश की माटी में रची-बसी है. देश का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. इस देश की माटी उन कांग्रेस नेताओं की ऋणी है, जिन्होंने अपने ख़ून से इस धरती को सींचा है. देश की आज़ादी में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुला पाएगा. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जी और आपने देश के लिए, जनता के लिए बहुत कुछ किया है. पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने विकास की जो बुनियाद रखी, इंदिरा गांधी जी ने उसे परवान चढ़ाया. राजीव गांधी जी ने देश के युवाओं को आगे बढ़ने की राह दिखाई. उन्होंने युवाओं के लिए जो ख़्वाब संजोये, उन्हें साकार करने में आपने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

जनता कांग्रेस के साथ खड़ी है, लेकिन उसे ईवीएम पर यक़ीन नहीं. उसे भरोसा नहीं कि उसका कांग्रेस को दिया वोट कांग्रेस के पक्ष में जाएगा भी या नहीं. इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप चुनाव आयोग से मांग करें कि वह चुनाव ईवीएम की बजाय मत पत्र के ज़रिये कराए, क्योंकि ईवीएम से अवाम का यक़ीन उठ चुका है.

आपकी शुभाकांक्षी
फ़िरदौस ख़ान
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और हर बार क़ब्र छोटी पड़ जाती

फ़िरदौस ख़ान
कल एक वाक़िया सुना... सच या झूठ, जो भी हो... लेकिन वो सबक़ ज़रूर देता है...
एक क़बिस्तान में एक क़ब्र खोदी गई... उस क़ब्र में लेट कर देखा गया कि क़ब्र सही है, छोटी तो नहीं है, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई... क़ब्र सही थी...
क़ब्र में मैयत को उतारा गया... लेकिन जैसे ही क़ब्र में मैयत रखी, क़ब्र छोटी पड़ गई... मैयत को ऊपर उठा लिया गया... फिर से क़ब्र को वसीह (बड़ा) किया गया... और उसमें मैयत उतारी गई... लेकिन फिर से क़ब्र छोटी पड़ गई... कई बार क़ब्र खोदी गई, लेकिन हर बार वह छोटी पड़ जाती... सब हैरान और परेशान थे... आख़िरकार मुर्दे को जैसे-तैसे दफ़नाया गया...
जिस शख़्स को दफ़नाया गया था, उसके बारे में घरवालों और आस-पड़ौस के लोगों से मालूमात की गई... मालूम हुआ कि उसने अपने भाइयों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया हुआ था... लोगों का मानना था कि इसी वजह से उसकी क़ब्र तंग हो गई थी...

हम ये तो नहीं जानते कि ये वाक़िया सच्चा है या झूठा... हां, लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने सोचने पर मजबूर कर दिया... आख़िर इंसान को चाहिये ही कितना होता है... दो वक़्त का खाना, चार जोड़े कपड़े... और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन... फिर भी क्यों लोग दूसरों की हक़ तल्फ़ी करके ज़मीन-जायदाद, माल और दौलत इकट्ठी कराते हैं... सब यही रह जाना है... साथ अगर कुछ जाएगा, तो वो सिर्फ़ आमाल ही होंगे...
फिर क्यों इंसान दूसरों को लूटने में लगा हुआ है...? ज़रा सोचिये...
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जब राहुल गांधी के ख़िलाफ़ लिखने को कहा गया...

फ़िरदौस ख़ान
ये उन दिनों की बात है, जब कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव (अब उपाध्यक्ष) राहुल गांधी भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ खड़े थे... और उन्होंने साल 2011 में जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ पदयात्रा की थी... उन दिनों हम एक अख़बार के लिए काम कर रहे थे... हमसे कहा गया कि हमें एक तहरीर लिखनी है, जो राहुल गांधी के ख़िलाफ़ हो और विपक्ष (अब सत्ता पक्ष) से जुड़े एक बड़े उद्योगपति के पक्ष में हो...
हमें ये बात बहुत ही नागवार गुज़री... हमारा मानना था कि हमें किसी ख़ास मुद्दे पर लिखने को कहा जाता... जिसका जैसा पक्ष होता, हम उसे उसी तरह पेश करते... बिना ये तय किए कि वह तहरीर किसकी हिमायत में जा रही है, और किसके ख़िलाफ़...
हमने कहा कि हम राहुल गांधी के ख़िलाफ़ नहीं लिखेंगे, अगर कोई बात उनके ख़िलाफ़ नहीं है तो... ऐसा करना सहाफ़त (पत्रकारिता) के उसूलों के ख़िलाफ़ है...
हमसे कहा गया कि हमें काम करना है, तो वही लिखना पड़ेगा, जो कहा जाएगा... हमने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया... और घर आ गए...
बाद में दफ़्तर से फ़ोन आया और हमें वापस बुला लिया गया... लेकिन फिर कभी हमसे राहुल गांधी के ख़िलाफ़ लिखने को नहीं कहा... ये काम अब और लोग कर रहे थे... बाद में हमने काम छोड़ दिया...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)


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नीले और सुनहरे रंग का स्वेटर...

फ़िरदौस ख़ान
जाड़ो का मौसम शुरू हो चुका था... हवा में ख़ुनकी थी... सुबहें और शामें कोहरे से ढकी थीं.. हम उनके लिए स्वेटर बुनना चाहते थे... बाज़ार गए और नीले और सुनहरे रंग की ऊन ख़रीदी... सलाइयां तो घर में रहती ही थीं... पतली सलाइयां, मोटी सलाइयां और दरमियानी सिलाइयां... अम्मी हमारे और बहन-भाइयों के लिए स्वेटर बुना करती थीं... इसलिए घर में तरह-तरह की सलाइयां थीं...
हम ऊन तो ले आए, लेकिन अब सवाल ये था कि स्वेटर में डिज़ाइन कौन-सा बुना जाए... कई डिज़ाइन देखे... आसपास जितनी भी हमसाई स्वेटर बुन रही थीं, सबके डिज़ाइन खंगाल डाले... आख़िर में एक डिज़ाइन पसंद आया... उसमें नाज़ुक सी बेल थी... डिज़ाइन को अच्छे से समझ लिया और फिर शुरू हुआ स्वेटर बुनने का काम... रात में देर तक जागकर स्वेटर बुनते... चन्द रोज़ में स्वेटर बुनकर तैयार हो गया...
हमने उन्हें स्वेटर भिजवा दिया... हम सोचते थे कि पता नहीं, वो हाथ का बुना स्वेटर पहनेंगे भी या नहीं... उनके पास एक से बढ़कर एक क़ीमती स्वेटर हैं, जो उन्होंने न जाने कौन-कौन से देशों से ख़रीदे होंगे... काफ़ी दिन बीत गए, एक दिन हमने उन्हें वही स्वेटर पहने देखा... उस वक़्त हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था... हमने कहा कि तुमने इसे पहन लिया... उन्होंने एक शोख़ मुस्कराहट के साथ कहा- कैसे न पहनता... इसमें मुहब्बत जो बसी है...
इस एक पल में हमने जो ख़ुशी महसूस की, उसे अल्फ़ाज़ में बयां नहीं किया जा सकता... कुछ अहसास ऐसे हुआ करते हैं, जिन्हें सिर्फ़ आंखें ही बयां कर सकती हैं, उन्हें सिर्फ़ महसूस किया जाता है... उन्हें लिखा नहीं जाता... शायद लिखने से ये अहसास पराये हो जाते हैं...
हम अकसर ख़ामोश रहते हैं, वो भी बहुत कम बोलते हैं... उन्हे बोलने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती... क्योंकि उनकी आंखें वो सब कह देती हैं, जिसे हम सुनना चाहते हैं... वो भी हमारे बिना कुछ कहे, ये समझ लेते हैं कि हम उनसे क्या कहना चाहते हैं... रूह के रिश्ते ऐसे ही हुआ करते हैं...
उनकी दादी भी उनके लिए स्वेटर बुना करती थीं...
सच ! अपने महबूब के लिए स्वेटर बुनना बिल्कुल उन्हें ख़त लिखने जैसा है... बस फ़र्क़ इतना है कि ख़त में जज़्बात को अहसासात को अल्फ़ाज़ में पिरोकर पेश किया जाता है, जबकि बुनाई में एक-एक फंदे में अपनी अक़ीदत को पिरोया जाता है... मानो ये ऊनी फंदे न हों, बल्कि तस्बीह हो...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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सांप्रदायिक सदभाव की अलख जगाती पुस्तक

मोहम्मद अफ़ज़ाल
प्रस्तुत पुस्तक ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में लेखिका फ़िरदौस ख़ान का उद्देश्य हिन्दुस्तान की उस तहज़ीब को प्रकाश में लाना है, जिसकी बुनियाद पर भारतीय समाज परवान चढ़ा. किसी भी देश की आत्मा को अगर समझना है, तो उसके लिए उस देश के समाज और उसकी प्रवृत्ति का अध्ययन अति आवश्यक है. जिस समाज का आधार प्रेम हो, वहां मानवता है. और अहिंसा मानवता का प्रतीक है. सम्राट अशोक के हाथ में जब तक तलवार रही, वह क्रूर और ज़ालिम कहलाया. जब उसने अहिंसा का दामन थामा, तो वह एक महान सम्राट अशोक बन गया. संसार में अगर कहीं कोई ऐसा समाज है, जहां मानवता, प्रेम और अहिंसा जिसके आचरण में विद्यमान है, वह हमारा प्रिय देश हिन्दुस्तान ही है. इसका वातावरण, जलवायु और इसकी मिट्टी जिसकी ख़ुशबू इतनी लुभावनी और मनभावन है कि जब उसकी ख़ुशबू वातावरण में रच-बसकर संसार में फैली तो इसकी ठंडक और महक को अरब तक महसूस किया गया और संसार के लिए देश आकर्षण आ केंद्र बन गया.

कोई व्यक्ति मानवता, प्रेम और अहिंसा का पाठ पढ़ने के लिए इस देश की ओर आकर्षित हुआ, तो कोई ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए हाथ में कांसा-ए- गदाई (भिक्षा पात्र) के साथ इसकी संस्कृति को नये आयाम देने के लिए यहां आया. क्योंकि वे जानते थे कि जिस सम्मान और प्रेम की उन्हें तलाश है, वह इसी पवित्र धरती पर उन्हें मिल सकता है. कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने तलवार के बल पर इसकी सभ्यता और संस्कृति को तबाह करने की कोशिश की, तो किसी ने छल-कपट और बल के द्वारा इस समाज की एकता की जड़ें हिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन ऋषि-मुनियों और औलिया, पीर-फ़क़ीरों ने अपनी अमर वाणी द्वारा मानवता, प्रेम और अहिंसा के इस दीपक को कभी बुझने नहीं दिया. उन्होंने यह सिद्ध करके दिखाया कि किसी जलधारा, मज़हब और धर्मों के उदगम स्थान अलग-अलग हो सकते हैं. मार्ग की कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करके निरंतर आगे बढ़ना उनके जीवन का प्रतीक है, लेकिन संगम ही उसको अमरता प्रदान करता है.

 ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक के नाम से ही यह ज्ञात हो जाता है कि इसमें ऐसी महान हस्तियों का बखान है, जिन्होंने संसार के किसी अन्य भूमि के टुकड़े पर जन्म लिया हो, लेकिन इस देश की माटी, संस्कृति के आकर्षण, मोह, ज्ञान और प्रेरणा से अपने आपको अछूता न रख सके तथा उनके क़दम बरबस इस धरती की ओर खींच लाए. कुछ ऐसे महापुरुष भी इस पुस्तक के केंद्र में हैं, जिनका जन्म इस धरती पर मुस्लिम परिवार में हुआ, लेकिन उनकी लेखनी और जीवन शैली पर हिन्दू देवी-देवताओं का राज था. रसखान मुस्लिम होते हुए भी दूसरे जन्म की कामना करते हैं. वह भी इस शर्त के साथ कि जन्म चाहे किसी भी रूप में हो, लेकिन जन्म स्थल ब्रज ही हो. सम्राट अकबर की पत्नी ताजबीबी भगवान श्रीकृष्ण की भक्त थीं, जिसे सम्राट अकबर ने भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा चित्र भेंट किया, जिसकी क़ीमत चित्रकार को इतनी दी कि उसे जीवन में कोई और चित्र बनाने की आवश्यकता ही न पड़े. इसके अलावा संत लालदास, भक्त लतीफ़ शाह, पेमी, अब्दुल समद, संत वाजिंद, संत बाबा मलेक ऐसे नाम हैं, जिन्होंने हिन्दू और हिन्दुस्तान की संस्कृति की सेवा की. इसमें कोई शक नहीं कि अगर उन्होंने यह कार्य किसी मुस्लिम देश में किया होता, तो उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता. मगर हमारी संस्कृति की महान उपलब्धि यही है कि हिन्दू परिवार में जन्म लेकर इस्लाम और मुस्लिम परिवार में जन्म लेकर हिन्दू संस्कृति का बखान किया गया है अर्थात अभिव्यक्ति की आज़ादी भी हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है.

लेखिका फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत पुस्तक में 55 महान हस्तियों का बखान किया है. उनमें से कुछ ऐसे महापुरुष भी हैं, जिन्होंने न तो इस धरती पर जन्म लिया और न ही वे कभी इस धरती पर आकर बसे, लेकिन उन्होंने भी अत्यंत कठिन मार्ग पर चलकर जनमानस की सेवा की. अर्थात जन्म,  उदगम स्थान और मार्ग कोई भी हो दानवता रूपी क्रूर राक्षस को इस धरती से मिटाना उनका उद्देश्य रहा. संसार में जहां कहीं भी प्रेम, मानवता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया जाता है, वहां भी भारतीय संस्कृति की ही आत्मा बसती है. लेखिका ने जिस सुंदर ढंग से 55 महान अनमोल मोतियों को पुस्तक रूपी अटूट माला में पिरो दिया, जिसका लाभ दिव्य दृष्टि रखने वाले पारखी पाठकजन अवश्य उठाएंगे.

लेखिका फ़िरदौस ख़ान का इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य मुस्लिम संत-फ़क़ीरों द्वारा जगाई गई प्रेम, अहिंसा और भाईचारे की अलख से जनमानस को अवगत कराना है. ये संत-फ़क़ीर बेशक राष्ट्रीय एकता का प्रतीक और गंगा-जमुनी तहज़ीब के स्तंभ हैं. अफ़सोस की बात तो यह है कि इनका ज़िक्र अकसर लोगों की ज़ुबान पर आता तो है,  लेकिन वो इसकी आत्मा से दूर और इसके अर्थ से आज तक नावाक़िफ़ रहे हैं. इस तहज़ीब को परवान चढ़ाने के लिए सिर्फ़ हाथ से हाथ मिलाना काफ़ी नहीं, बल्कि साथ-साथ चलकर ऐसे मधुर संगम को प्राप्त करना है, जहां केवल प्रेम, अहिंसा और मानवता का वास हो.
(लेखक मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक हैं)


किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

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इश्क़

इश्क़ की मंज़िल शादी नहीं, इबादत हुआ करती है... हमारा मानना है कि इश्क़ कभी नाकाम नहीं होता... दिल में इश्क़ का जज़्बा होना ही, ज़िन्दगी को मुकम्मल कर देता है... जो लोग इश्क़ को शादी से जोड़कर देखते हैं, वो इश्क़ को समझे ही नहीं हैं... इश्क़ का अगला दर्जा शादी नहीं, इबादत हुआ करता है...
इश्क़ अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत हुआ करती है... बहुत ख़ुशनसीब हुआ करते हैं, वो लोग जिनकी रूह की ख़ुशबू से मुअत्तर है...

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तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...


मेरे महबूब !
अज़ल से अबद तक
ऐसा ही होता आया है
और
ऐसा ही होता रहेगा
मुहब्बत के नसीब में
हिज्र के दिन हैं
और
हिज्र की ही रातें हैं...

जान !
मैं नहीं जानती
मेरी क़िस्मत में
तुम्हारा साथ लिखा
भी है या नहीं...

मैं सिर्फ़ ये जानती हूं
कि मैं जहां भी रहूं
जिस हाल में भी रहूं
ये दुनिया हो
या वो दुनिया
तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...
-फ़िरदौस ख़ान

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किसी का चले जाना

ज़िन्दगी में कितने लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें हम जानते हैं, लेकिन उनसे कोई राब्ता नहीं रहता... अचानक एक अरसे बाद पता चलता है कि अब वह शख़्स इस दुनिया में नहीं रहा, तो होश फ़ाख़्ता हो जाते हैं... हमें एक ऐसे ही शख़्स के बारे में पता चला, जो अब इस दुनिया में नहीं है... फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल तलाशी...  बहुत पुरानी एक पोस्ट नज़र आई... हमने उस शख़्स को फ़्रेंड रिक्वेस्ट भेजी, फ़ॊलो किया, मैसेज किया,  कमेंट लिखा, ये जानते हुए कि फ़्रेंड रिक्वेस एक्सेप्ट करने के लिए अब वह इस दुनिया में नहीं है... न ही हमें हमारे मैसेज का जवाब मिलेगा और न ही वह कमेंट को लाइक कर सकता है और न ही जवाब दे सकता है...
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हिज्र का मौसम

मेरे महबूब !
ये हिज्र का मौसम है
और
इस हिज्र के मौसम में
दिन और रात
तवील हो जाते हैं
बिल्कुल रोज़े-मेहशर की तरह...

कब सुबह होती है
कब दोपहर ढलती है
कब शाम घिर आती है
और कब रात दहक उठती है

इस ठहरे हुए इक पल में
सदियां गुज़र जाती है
क्योंकि
ये हिज्र का मौसम है...
-फ़िरदौस ख़ान
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एक क़बूतर, जिसे हम कभी भूल नहीं पाएंगे...

जो चीज़ें हमें ख़ुशी देती हैं, दुख भी अकसर उन्हीं से मिला करता है... किसी से लगाव होना एक इंसानी फ़ितरत है, एक अहसास है... लगाव जहां ख़ुशी देता है, वहीं आंखें भी नम कर देता है...

हाल ही की बात है... हमने खिड़की खोली तो, सामने वाले घर की खिड़की के नीचे एक क़बूतर लटका हुआ था... उसकी गर्दन में मांझा फंसा हुआ था... यौमे-आज़ादी के दिन दिन भर ख़ूब पतंगें उड़ाई गईं... किसी कटी पतंग का मांझा क़बूतर की गर्दन में फंस गया... जिससे उसकी मौत हो गई...

हमारी निगाहें आज इसी क़बूतर को तलाश रही थीं... लेकिन हमें ये नहीं पता था कि वह मर चुका है... दरअसल, इस क़बूतर की गर्दन पर एक निशान था... हम जब भी दाना डालने जाते, वह सबसे पहले आ जाता... अगर दाना ख़त्म हो जाता, और उसके भूख लग रही होती, तो अंगनाई में हमारा सामने टहलने लगता... उसे देखकर हम समझ जाते कि उसे भूख लगी है...

कुछ दिन पहले की बात है... बहुत तेज़ बारिश हुई थी... सारा दाना बारिश के पानी में बह गया... हम अंगनाई धो रहे थे... वह कबूतर हमारे सामने आकर मुंडेर पर बैठ गया... हमने उनसे कहा कि क़बूतर को दाना डाल दो... उन्होंने कहा कि तुम ही दाना डालो... हमने कहा कि हम अंगनाई धो रहे हैं, आप ही दाना डाल दो... उन्होंने दाना डाला, लेकिन क़बूतर दूर बैठा देखता रहा, दाने के पास नहीं आया... उन्होंने कहा, "मैंने पहले ही कहा था कि तुम दाना डालो. देखा क़बूतर नहीं आया न... वो तुम्हारे डाले हुए दाने ही खाएगा"...

जैसे ही हम दाना डालने के लिए गए, हमें देखते ही क़बूतर नीच आ गया... और दाना चुगने लगा... उसकी देखादेखी और क़बूतर भी आ गए...

सच ! परिन्दों को भी कितनी पहचान होती है अपने-पराये की...  न जाने क्यों उसका अक्स हमारी नज़रों के सामने से हट ही नहीं पा रहा है... इस क़बूतर को हम कभी नहीं भूल पाएंगे...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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