तुम्हारी मुहब्बत के फूल...


मेरे महबूब...
उम्र की रहगुज़र में 
हर क़दम पर मिले 
तुम्हारी मुहब्बत के फूल...
अहसास की शिद्दत से दहकते 
जैसे सुर्ख़ गुलाब के फूल...

उम्र की तपती दोपहरी में 
घनी ठंडी छांव से 
जैसे पीले अमलतास के फूल...

आंखों में इन्द्रधनुषी सपने संजोये
गोरी हथेलियों पर सजे 
जैसे ख़ुशरंग मेहंदी के फूल...  

दूधिया चांदनी रात में 
ख़्वाहिशों के बिस्तर पर बिछे 
जैसे महकते बेला के फूल...

मेरे महबूब 
मुझे हर क़दम पर मिले 
तुम्हारी मुहब्बत के फूल...
-फ़िरदौस ख़ान  

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आज प्रोमिस डे है


आज प्रोमिस डे है...यानी वादों का दिन... एक-दूजे से वादा करने का दिन...
लेकिन हम मानते हैं कि सबके अपने-अपने प्रोमिस डे हुआ करते हैं... जो किसी भी माह के किसी भी दिन, किसी भी तारीख़ को हो सकते हैं... बहरहाल, इसी बहाने कुछ गुज़श्ता लम्हे सामने आकर खड़े हो गए...
बात कई बरस पुरानी है... वो अपनी अम्मी के साथ खड़े थे... हम भी वहां थे... न जाने क्यों मन बहुत उदास था, इतना उदास कि बयान से बाहर... बाज़ दफ़ा ऐसा होता है कि मन बहुत उदास होता है, लेकिन हमें उदासी की वजह ख़ुद मालूम नहीं होती... शायद हम इस बारे में सोचते ही नहीं हैं कि हम उदास क्यों है... इसी तरह कई मर्तबा दिल बहुत ख़ुश होता है... इतना ख़ुश कि हवाओं में उड़ने का दिल चाहता है...
ख़ैर, उनकी नज़र हम पर पड़ी... और वो हमारे क़रीब आ गए... उन्होंने हमसे ’कुछ’ कहा... कुछ ऐसा कि हम उन अल्फ़ाज़ को कभी भूल ही नहीं सकते... उनका एक-एक लफ़्ज़ हमारी रूह पर लिखा गया... मुहब्बत की शिद्दत के रंग इतने गहरे थे कि हमारी रूह ही नहीं, हमारा तन-मन भी उन रंगों में रंग गया...
वो शायर नहीं हैं, लेखक नहीं हैं, कोई फ़नकार भी नहीं हैं... जिस पेशे से वो ताल्लुक़ रखते हैं, उसके मद्देनज़र हम सोच भी नहीं सकते थे कि वो मुहब्बत के जज़्बे से सराबोर रूहानी अल्फ़ाज़ का इस तरह से इस्तेमाल भी कर सकते हैं... किसी शायर ने भी शायद ही अपनी महबूबा से इन अल्फ़ाज़ में अपनी मुहब्बत का इक़रार किया होगा... उससे कोई वादा किया होगा...
वाक़ई, मुहब्बत इंसान को किस बुलंदी पर पहुंचा देती है... शायद इसीलिए, मुहब्बत में एक बादशाह तक अपनी महबूबा की ग़ुलामी दिल से क़ुबूल कर लेता है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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टेडी बियर

ज़िन्दगी में ऐसे मुक़ाम भी आया करते हैं, जब इंसान बहुत अकेला होता है... इतना अकेला कि उसे दूर-दूर तक कोई ऐसा दिखाई नहीं देता, जिससे पल दो पल वो अपने दिल की बात कर सके, जिसे बता सके कि वो कितना अकेला है... उसके पास कोई ऐसा नहीं होता, जिसे वो अपना कह सके... ऐसी हालत में कई बेजान चीज़ें अकेलेपन का सहारा बन जाया करती हैं, भले ही वह टेडी बियर जैसा कोई खिलौना ही क्यों न हो...

बहुत साल पहले की बात है. हमारे छोटे भाई ने हमारी सालगिरह पर तोहफ़े में हमें एक टेडी बियर दिया... हमें वह बहुत अच्छा लगा... हालत ये थी कि हम उसे बैग में रखते... यानी हम जिस शहर भी जाते, वह टेडी बियर हमारे साथ जाता...

जब घर से दूर होते, अकेले होते, उदास होते, तो वह टेडी बियर हमारा साथी होता... अम्मी ने कहा कि ये क्या बचपना है... हमने उसे अपनी अलमारी में रख दिया... जब मालूम हुआ कि आज टेडी डे है, तो न जाने क्यों उस टेडी बियर की बहुत याद आ रही है... वह बियर हमसे दूर है... इंशा अल्लाह इस बार उसे साथ लेकर आएंगे...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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तुम्हारे नाम की आंच

मेरे महबूब !
तुम्हारे नाम की आंच ने
मुझे आ घेरा है
जब से
क़ुदरत ने
मौसम में बर्फ़ घोली है...
-फ़िरदौस ख़ान
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तुम हो जाऊं...

मेरे महबूब !
मैं
मैं न रहूं
तुम हो जाऊं...
-फ़िरदौस ख़ान
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गुनगुनी धूप

मेरे महबूब !
जाड़ो की
ख़ुनकी में
गुनगुनी धूप का
अहसास हो तुम...
-फ़िरदौस ख़ान

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सूफ़ियाना बसंत पंचमी...

फ़िरदौस ख़ान
सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है... हमारे पीर की ख़ानकाह में बसंत पंचमी मनाई गई... बसंत का साफ़ा बांधे मुरीदों ने बसंत के गीत गाए... हमने भी अपने पीर को मुबारकबाद दी... हमने भी अल सुबह अपने पीर को मुबारकबाद दी... और उन्होंने हमेशा की तरह हमें दुआएं दीं...

बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं... क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं...
कहा जाता है कि यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी... हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह) को अपने भांजे सैयद नूह की मौत से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने पीर की ये हालत देखी न गई... वह उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे... एक बार हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे... उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास हिन्दू श्रद्धालु नाच-गा रहे हैं... ये देखकर हज़रत अमीर ख़ुसरो को बहुत अच्छा लगा... उन्होंने इस बारे में मालूमात की कि तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए...
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वह भी अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे... फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुच्छे बनाए और नाचते-गाते हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह) के पास पहुंच गए... अपने मुरीद को इस तरह देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई... तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो बसंत पंचमी मनाने लगे...


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नारी की नारी की संपूर्णता और प्रेम...

फ़िरदौस ख़ान
समय बदला, हालात बदले लेकिन नहीं बदली तो नारी की नियति. नारी सदैव प्रेम के नाम पर छली गई. उसने पुरुष से प्रेम किया, मन से, विचारों से और तन से. मगर बदले में उसे क्या मिला धोखा और स़िर्फ धोखा. पुरुष शायद प्रेम के महत्व को जानता ही नहीं, तभी तो वह नारी के साथ प्रेम में रहकर भी प्रेम से वंचित रह जाता है, जबकि नारी प्रेम में पूर्णता प्राप्त कर लेती है. राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. प्रतिभा रॉय की पुस्तक महामोह अहल्या की जीवनी में नारी जीवन के संघर्ष की इसी कथा-व्यथा को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है. डॉ. प्रतिभा रॉय कहती हैं कि अहल्या एक पात्र नहीं, एक प्रतीक है. जब प्रतीक व्याख्यायित होता है, तब एक पात्र बन जाता है. जब पात्र विमोचित होता है, तब दिखने लगता है प्रतीक में छिपा अंतर्निहित तत्व. अहल्या सौंदर्य का प्रतीक है, इंद्र भोग का, गौतम अहं का प्रतीक है, तो राम त्याग एवं भाव का प्रतीक है. महामोह की अहल्या वैदिक नहीं है, पौराणिक नहीं है, ब्रह्मा की मानसपुत्री नहीं है, वह ईश्वर की कलाकृति हैं, चिरंतन मानवी हैं. वैदिक से लेकर अनंतकाल तक है उनकी यात्रा. वे अतीत में थीं, वर्तमान में हैं, भविष्य में रहेंगी. मोक्ष अहल्या की नियति नहीं, संघर्ष ही है उनकी नियति. अहल्या के माथे से कलंक का टीका नहीं मिटता. अत: अहल्या देवी नहीं है, अहल्या है मानवीय क्रांति. अहल्या का संघर्ष केवल नारी का संघर्ष नहीं है, न्याय के अधिकार के लिए मनुष्य का संघर्ष है.
अहल्या अपने द्वार पर आए इंद्र से पूछती है-क्या वरदान चाहिए प्रभु?
मैं हाथ जो़डे ख़डी थी. अपने मनोरम हाथ ब़ढाकर उन्होंने मेरी हथेली को स्पर्थ किया. स्पर्श के अहसास से ज़ड में भी जान आ जाती है. यह कैसा मधुकंपन होने लगा मेरे भीतर? अनुभूत सुख ढूंढते-ढूंढते मानो मैं परमानंद प्राप्त करने का जा रही थी. अपने हाथ का स्पर्श देने से अधिक भला मैं और क्या कर सकती थी? एक स्पर्श में ही अथाह शक्ति होती है? मेरा लौहबंधन तार-तार हो गया स्पर्श की शक्ति से. महाकाल के वक्ष पर वे अभिलाषा पूर्ण घ़िडयां थीं नि:शर्त. वहां लाभ-हानि, यश-अपयश, अतीत-भविष्य, स्वर्ग-नर्क, वरदान-अभिशाप का द्वंद्व नहीं था, जबकि प्रतिश्रुति, वरदान और प्रतिदान की कठोर शय्या पर पैर रखकर उतर आई थीं वे घ़िडयां देह से मनोभूमि में.
मुझे यह अनुभूति हुई कि सारी सीमाएं अनुशासित होते हुए भी मेरे भीतर ऐसा कोई नहीं था, जिसने मुझे अगम्य स्थान की ओर उ़ड जाने को प्रेरित किया. उस शक्ति ने सारे बंधन और बेडियां तो़ड डालीं. बे़डियां तो़डना मनुष्य का सहज स्वभाव है. रिश्ते जब बे़डियां बन जाते हैं, तभी वे रिश्ते टूटते हैं, बंधन टूटते हैं. बंधन टूटने के विषाद और मुक्ति के उद्‌घोष एवं विषाद-प्रफुल्लित भावावेग से वे घ़िडयां थीं मधुर पी़डादायी. वह घ़डी, निष्कपट समर्पण की घ़डी है. स्वयं को दूसरे के लिए उ़डेल देने की घ़डी. वह घ़डी थी प्रेम की घ़डी, जिस प्रेम मंं दूसरा पक्ष नहीं होता. लेन-देन का हिसाब नहीं होता. उस घ़डी का आकर्षण दुर्दम्य होता है कि वहां पाम-पुण्य, नीति-नियम अंधे और बहरे हो जाते हैं. उस घ़डी मेरे भीतर छल-कपट नहीं था. वह घ़डी निष्कपट, विशुद्ध प्रेम की घ़डी थी. उस समय मैं विभाजित नहीं थी. पूरी की पूरी इंद्र की थी. वह घ़डी भ्रांति की घ़डी नहीं थी, क्रांति की घ़डी थी. उस घ़डी ने प्रलय को स्तब्ध कर दिया था.
मैं नहीं जानती, प्रेम की वह घ़डी इंद्र के लिए नि:शर्त और निष्कपट थी या नहीं, किंतु नारी के लिए प्रेम नि:शर्त होता है. देह भोग की वासना उस प्रेम की शर्त नहीं होती, किंतु क्या पुरुष के लिए देह भोग प्रेम की शर्त है? अत: प्रेम की उपलब्धि से इंद्र की अपूर्णता पूर्ण हुई या नहीं, मैं नहीं जानती. किंतु मैं पूर्ण, परिपूर्ण हो गई थी. मैं इंद्रलुब्धा नहीं थी-मैं थी इंद्रमुग्धा. मैं इंद्र से होकर उत्तरण के सोपानों पर च़ढती जा रही थी, पृथ्वी की अतल में, आकाश से होते हुए आकाश से भी ऊंची. इंद्रिय आनंद से इंद्रानंद में-परमानंद की उपलब्धि में. इंद्रानंद सोमरस पान की तरह अपार्थिव है.
आत्म मुक्ति या जगत की मुक्ति? इस प्रश्न का उत्तर इंद्र पा चुके थे. आत्म मुक्ति के द्वार पर इंद्र सदैव बाधा उत्पन्न करते हैं. क्या गौतम के यक्ष का लक्ष्य आत्म मुक्ति था? अपरिपक्व, ज्ञान, साधना और अनुभूति के बिना उत्तरण, मुक्ति और अमरत्व की कामना करना विडंबना है. देवतागण मनुष्य की इस बुरी आकांक्षा का विरोध करते हैं. संभवत: इसलिए इंद्र ने गौतम का विरोध किया और मुझे प्रदान की सत्य की अंतरंग अनुभूतियां. स्वाहा है यक्ष की आत्मा. यक्ष के मंत्र का अंतिम और श्रेष्ठ भाग है स्वाहा. सु-आहुति स्वाहा का श्रेष्ठ गुण है. मैंने इंद्रदेव के लिए स्वयं को स्वाहा कर दिया. मेरी मिथ्या देह है सत्य की सिद्धिभूमि. मैं थी कन्या, पत्नी, गृहिणी, किंतु मैं नारी नहीं बन पाई थी. इंद्र के स्पर्श से मैं नारी बन गई. मैं पूर्ण हो गई. पूर्ण से पूर्ण निकालने की शक्ति भला किसमें है? यदि किसी में हुई तो पूर्ण से पूर्ण निकल जाने पर भी मैं पूर्ण ही रहूंगी.
हे, इंद्रदेव! मैं कृतज्ञ हूं. आपने मुझे पूर्णता का अहसास कराया. आपने मेरे ज़ड बन चुके नारीत्व में फिर से प्राण फूंक दिए.
मैंने इंद्रदेव को प्रणाम किया. प्रभात हो चला था. क्या पक्षियों ने रात का महाप्रलय का सामना नहीं किया? उनके कलरव में कहीं कोई अस्वाभाविकता नहीं थी. इंद्रदेव प्रस्थान करने को उतावले थे. विदा की घ़डी आ गई. इंद्रदेव निर्लिप्त-निराकार थे. किंतु वे तृप्त थे, यह स्वीकारने में उनमें कोई झिझक नहीं थी.
अहल्या, मैं तृप्त हुआ. तुम्हारा दान अतुलनीय है. प्रेम की चिर-आराध्या देवी बनकर तुम मेरी अंतरवेदी में सदैव पूजी जाओगी. आज के इस देह-संगम की स्मृतियां, तुम्हारी देह की सारी सुरभित सुगंध मेरी देह की समस्त ग्रंथियों में सदा भाव-तरंग बनाते रहेंगे. तुम्हारे पति के पदचाप सुनाई देने लगे हैं. मैं तुम्हारा मुक्तिदाता नहीं, मैं तुम्हारा भाग्य और नियति नहीं. मैं तुम्हारी परीक्षा भी नहीं. तुम स्वयं ही अपनी परीक्षा, भाग्य और नियति हो. साधना का द्वार अब तुम्हारे लिए खुल चुका है. मुझे विदा दो और अपनी रक्षा करो.
इंद्र के विदा होते समय मुझे ठेस नहीं पहुंच रही थी, क्योंकि मैं जानती थी, मैं मर्त्य की नारी हूं. इंद्र मेरे भाग्यविधाता नहीं बन सकते. यह विदाई तय थी. किंतु मुझे ऐसी अवस्था में छो़डकर, गौतम के पहुंचने से पहले किसी लम्पट पुरुष की तरह जल्दी-जल्दी वहां से भागने लगना मुझे बहुत कष्ट दे रहा था. तो क्या इंद्र भाव के सम्राट नहीं हैं, क्या वे भोग-लम्पट हैं, एक सामान्य पुरुष? क्या मेरे क्षणभंगुर सुंदर देहभूमि पर विजय पताका फहराकर गौतम को नीचा दिखाना था इस प्रेम का लक्ष्य? तब तो यह प्रेम नहीं था, एक भ्रांति थी. क्या मैं इंद्रयोग्या नहीं थी, इंद्रभोग्या थी? यह सोचकर दुख और आत्मग्लानि से उदास हो उठी. इंद्र ने गर्व के साथ गौतम का सामना किया होता तो मैं इंद्र को परम प्रेमी के स्थान पर रखकर बाक़ी का जीवन पूर्णता से रंग लेती. प्रेम निर्भीक होता है, प्रेम निरहंकार होता है, प्रेम नि:स्वार्थ होता है, जबकि एक कामुक पुरुष की तरह अपने स्वार्थ को ब़डा करके ऋषि के कोप के भय से मुझे असहाय अवस्था में छोड कर वहां से खिसक लेने के कारण मेरे सच्चे अहसास पर एक काली रेखा खींच दी उन्होंने. यह प्रेम है या भ्रम, पाप है या पुण्य? उचित है या अनुचित?
किंतु मैंने जो कुछ किया, जान-बूझकर किया. जब आत्मा प्रेम के लिए समर्पित हो जाती है, तब देह अपनी सत्ता खो देती है और आत्मा के साथ देह भी समर्पित हो जाती है. इसलिए उस क्षण मुझमें ग्लानि या पापबोध नहीं हुआ. मिलन के सुख और विरह के दुख दोनों से मेरा नारीत्व आज परिपूर्ण था.
बहरहाल, यह किताब बेहद रोचक है. लेकिन संस्कृतनिष्ठ हिंदी होने के कारण पाठकों को कुछ शब्दों को समझने में द़िक्क़त पेश आ सकती है. अगर भाषा थो़डी सरल होती तो सोने पे सुहागा होता.

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पश्चिमी संस्कृति की गाथा

फ़िरदौस ख़ान
कश का विनाश इतालवी लेखक की पुस्तक द रुइन ऑफ कश का हिंदी अनुवाद है. यह एक अच्छी बात है कि विदेशी भाषाओं की श्रेष्ठ पुस्तकों का हिंदी अनुवाद आसानी से मिल जाता है. इस पुस्तक का अनुवाद बृजभूषण पालीवाल ने किया है. हक़ीक़त में यह किताब पश्चिमी संस्कृति, साहित्य, क्रांति और प्रबोधन की गाथा है. पैनोरामा मेस में इटालो काल्विनो लिखते हैं-द रुइन ऑफ कश, दो विषय लेती है. प्रथम है टैलीरॉ और दूसरा है बाकी सब चीजें. और बाकी सब चीजों में वे सब चीजें शामिल हैं, जो मानव इतिहास में घटित हुई हैं, सभ्यता की शुरुआत से लेकर आज तक. यह एक ऐसी पुस्तक है जो अपने आपको एक भटकन और आवारापन में उजागर करती है, अपनी कल्पना, मनमर्जी और कभी न तृप्त होने वाली जिज्ञासा से मार्गदर्शन प्राप्त करती है, और बनी हुई है टुकड़ों से, इधर-उधर भटकने से, कहानियों, लघुकथाओं और कहावतों से. यह सब इसलिए कि इसे एक अविरल आनंद के साथ पढ़ा जा सके.

सिविलिजेशन में जे टॉल्सन लिखते हैं-ऐसा लगता है कलासो ने मांग करती और कुरेदने वाली पुस्तक को बनाने में कम से कम एक राष्ट्रीय पुस्तकालय को खंगाला होगा. इसकी विषय वस्तु आधुनिक मस्तिष्क का छिछलापन है और आधुनिक संस्कृति की कार्यविधि के कारण ही जिसका कलासो ऐसी बारीकी से विश्लेषण करते हैं. मैं उस विश्लेषण का प्रयोग करने में हिचक रहा हूं ,जिसके योग्य यह पुस्तक सर्वथा है. मास्टर पीस सभी महान पुस्तकों की भांति यह पुस्तक हमें अधिक पढ़ती है और हम इसे कम पढ़ते हैं और कला या चिंतन की महान रचनाओं के समान ही यह आपको अपना जीवन बदलने के लिए विवश कर सकती है.

रॉबर्तो कलासो लिखते हैं- सबसे सहज और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना चाहिए, क्या वैदिक संबंध सच्चे हैं. उनका अध्ययन करते समय हम धीरे-धीरे उनके अद्भुत पेचीदा जाल को, हर चीज़ पर फैला हुआ है, दोबारा बना लेते हैं. और जिस क्षण से हम संसार में प्रवेश करते हैं, हम यह देखने पर विवश हैं कि यह माचिस की तीलियों का विशाल गिरजाघर है, श्रेष्ठ और निरर्थक. हम जानते हैं कि जीवन स्वयं को किसी न कियी तरीके से, इनकी सहायता के बिना भी पुन उत्पन्न कर लेता है. फिर भी हम गुंजन की उन परतों की ओर, जो हर चीज़ को अपने अंदर लपेटे हुए है, अदम्य रूप से आकृष्ट होते हैं. और हम चाहें जो कुछ सोचें एक बिंदु पर हम यह अनुभव करते है. कि न चाहते हुए भी हम उस अधडूबे लबादे के एक कोने का प्रयोग करते हैं. वैदिक संबंधों को पूरी तरह अस्वीकार करने में सफ़ल होने वाला जीवन का एकमात्र स्वरूप बैन्थम का है, हमारा फ़राओ आज लंदन में एक ममी है. एक अनजान जीवन. वैदिक संबंध भव्य रूप में निरर्थक हैं तो बैन्थम भव्य रूप से अपर्याप्त. हम अधर में लटके रहे हैं, भटकते हुए.
किसी ऐसे व्यक्ति के होठों पर बलिदान की भाषा सर्वाधिक घिनौनी या काल्पनिक लगती है, जो उसके आधार वाक्य को नहीं जानता. किसी ऐसे व्यक्ति के हाथों बलिदान का कर्म अत्यंत विध्वंस भरा लगता है जो इसके आधार वाक्य तक को नहीं जानता. किसी ऐसे व्यक्ति से बलिदान संबंधी शब्द सुनने और इसके हाव-भावों को देखने से अधिक बुरा कुछ नहीं जो इसके आधार वाक्य तक को नहीं जानता. वरुण वह उद्गम है जो जीवन को रोकता है और जिसके बिना जीवन असंभव है. जीना शुरू करने के लिए वरुण के फंदे कटने चाहिए और जीते रहने के लिए हमें आदिकालीन द्रव से गीला होने, इससे जुड़ने की ज़रूरत है.

वर्षों के शोध के पश्चात दो बडे़ विद्वान वैदिक ऋषियों के विषय में यह कहते हैं- लिलियन सिल्बर्न के अनुसार, वैदिक ऋषि की दृष्टि में तात्कालिक, आदिकालीन के अनंत, अनेक रूपाकार वाले, जटिल पहलू हैं. दिन के बाद दिन आने की कोई गारंटी नहीं है और ब्रह्मांड की स्थिरता निरंतर ही पुन स्थापित की जानी है. वैदिक ब्रह्मांड, व्यवहार में क्षोभ, संकुचन और दबाव का दुख भरा ब्रह्मांड है, जो उद्गम के गहरे अंधेरे सागर की सी छवि लिए हुए है. वैदिक ऋषि के लिए कुछ भी निश्चित नहीं है. मानव जीवन या नहीं, सूर्योदय, या पानी का गिरना भी नहीं.  इस प्रकार ऋग्वेद की अधिकांश ऋचाएं एकाकी योजना के अनुरूप हैं. जिस ईश्वर का आह्वान किया जाता है उसे फिर बतलाया जाता है कि वह उसी कल्याणकारी, सहायक कार्य को करे, जो उसने बहुत पहले किसी ब्रह्मांडीय अथवा श्रेष्ठ बलिदानी व्यक्ति के लिए किया था और अंतिम ऋचाओं में उससे विनय की गई है कि वह उसी कार्य को अगले सूर्योदय के समय पुन करे, क्योंकि लोग सामान्यत उस क्षोभ से बचना, रक्षित होना चाहते हैं, जो रात्रि में किसी सहारे के अभाव में उन्हें घेर लेता है.

जेसी हीस्टरमैन के मुताबि़क, वैदिक चिंतन के लिए समूचा विश्व निरंतर दो ध्रुवों के बीच घूमता रहता था. जन्म और मृत्यु समग्रीकरण और विखंडन, आरोहण और अवरोहण के धु्र्वों के बीच जो अपनी अंतर्क्रिया द्वारा ब्रह्मांड में एक चक्रीय लय उत्पन्न करते हैं.
अंत में, यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि इस पुस्तक के बिना आपकी लाइब्रेरी अधूरी है.

समीक्ष्य कृति : कश का विनाश
लेखक : रॉबर्तो कलासो
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 432
मूल्य : 600 रुपये
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ज्वलंत सवाल उठाता उपन्यास

फ़िरदौस ख़ान
दुनिया भर में महिलाओं को दोयम दर्जे पर रखा गया है. जन्म से लेकर मौत तक महिला कभी पिता पर, कभी पति पर और कभी अपने पुत्र पर निर्भर रही है. इसी निर्भरता की वजह से पुरुषों की नज़र में महिलाएं अबला और भोग्या बनकर रह गईं. लेकिन इतिहास गवाह है कि शिक्षित और आत्मनिर्भर महिलाओं ने पुरुषों के वर्चस्व से निकलकर ख़ुद अपनी अलग पहचान बनाई है. उषा प्रियंवदा का चर्चित उपन्यास शेष यात्रा भी एक ऐसी ही महिला की कहानी है, जो पति पर आश्रित है. यह उपन्यास 1984 में प्रकाशित हुआ था. तीन दशक बाद इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ है. इस उपन्यास में एक ज्वलंत सवाल उठाया गया है कि क्या पुरुष पर आश्रित रहना ही नारी जीवन का यथार्थ है? पुरुष उसका अन्नदाता है, क्या सिर्फ़ इसीलिए उसे अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का हक़ नहीं है? उपन्यास में इस सवाल का जवाब भी दिया गया है कि नारी जीवन का यथार्थ उसका अपना स्वाभिमान और स्वावलंबन है. उपन्यास की नायिका अनुका यानी अनु एक छोटे से क़स्बे की लड़की है. पढ़ाई के दौरान ही अमेरिका में रहने वाले एक डाक्टर प्रणव से उसका विवाह हो जाता है. पति उसे हर सुख-सुविधा का सामान देता है, जिसके कारण वह हमेशा अपने भाग्य को सराहती है और पति के प्रति नतमस्तक रहती है. वह ख़ुद को पति के अनुरूप ढालने की कोशिश करती है. उसके लिए उसका पति और उसका घर ही उसकी दुनिया है. पति और घर के अलावा किसी और चीज़ के बारे में वह कभी सोचती तक नहीं है. जो ज़िम्मेदारी प्रणव ने उसे पकड़ाई थी, जो भूमिका दी गई थी, वह निभा रही थी. खाना बनाना, घर साफ़-सुथरा रखना,
प्रणव की पोज़िशन के अनुसार कपड़े पहनना, पार्टियों में चुपचाप मुस्कराते रहना. पहले यह सब उसे बहुत अच्छा लगता था, मगर जल्द ही वह पुरुष सत्ता की वास्तविकता को समझ जाती है, क्योंकि वक़्त के साथ-साथ प्रणव बदलने लगा. पहले तो वह देर से घर आने लगा और बाद में कई-कई दिन तक शहर से बाहर रहने लगा. इस दौरान अनु ने महसूस किया कि उसे शिफ़ौन की जगह रेशम अच्छा लगता है. नारंगी और पीले रंग की जगह बैंगनी और हरे रंग. फूल पत्ती के छापे की जगह ज्यामिति रेखाएं. लेकिन वह तो हमेशा ही पति की पसंद के अनुसार कपड़े पहनती आई है. प्रणव ने कभी उसकी पसंद-नापसंद जानने की कोशिश ही नहीं की. वह अपने लिए ऐसी पत्नी चाहता था, जिसकी अपनी कोई इच्छा न हो, वह बस एक यंत्र की तरह प्रणव के कहने पर उसके आदेश का पालन करती रहे. अनु के रूप में उसे ऐसी पत्नी मिल भी गई, लेकिन जल्द ही प्रणव का उससे मन भर गया. अब उसे कामकाजी पत्नी चाहिए थी, जो उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सके.

बहरहाल, एक दिन अनु को ज्योतसना बेन से पता चलता है कि प्रणव शिकागो में एक महिला के साथ रहता है. शादी से पहले भी कई महिलाओं के साथ उसके संबंध रह चुके हैं और शादी के बाद भी वह अनेक महिलाओं के साथ संबंध बनाए हुए है. यानी वह शादी के बाद भी नहीं सुधरा. यह सब जानकर अनु बुरी तरह टूट जाती है. उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है. इसलिए कुछ वक़्त तक उसे पागलख़ाने में भी रहना पड़ा. मानसिक स्थिति ठीक होने पर वह घर लौट आती है. वह प्रणव से इस बारे में बात करना चाहती है, तो वह उससे साफ़-साफ़ कह देता है कि वह अब उसके साथ और नहीं रह सकता. इसलिए बेहतर है कि दोनों अपने-अपने रास्ते चुन लें. वह प्रणव को मनाने की बहुत कोशिश करती है, लेकिन वह नहीं मानता. आख़िरकार दोनों अलग हो जाते हैं. अनु की दुनिया उजड़ जाती है. उसे अपने चारों तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है. उसे कहीं कोई अपना नज़र नहीं आता. वह अपने ननिहाल लौटना नहीं चाहती, क्योंकि वह जानती है कि समाज उसे चैन से जीने नहें देगा. उसे बहुत-सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. लेकिन वह हार नहीं मानती और डाक्टरी की पढ़ाई शुरू कर देती है. वह अपनी सहेली दिव्या के भाई दीपांकर से विवाह कर लेती है. दीपांकर भी डाक्टर है, लेकिन वह प्रणव जैसा नहीं है. वह डाक्टर बन जाती है. उसकी एक बेटी होती है. अब उसका अपना भरा पूरा परिवार है. दीपांकर के साथ वह स्वावलंबन का जीवन जीती है.

बेशक, महिला जब तब तक ही कमज़ोर है, जब तक वह ख़ुद को कमज़ोर समझती है. अगर वह हिम्मत के साथ हालात का सामना करे, तो यक़ीनन जीत उसी की होगी. यह उपन्यास नारी-विमर्श की बहस के दौरान उठाए जाने वाले सवालों के जवाब देता नज़र आता है.

समीक्ष्य कृति : शेष यात्रा
लेखिका : उषा प्रियम्वदा
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
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